बुनियाद
असमानताओं और अन्याय के बुनियादी कारणों और समकालीन सामाजिक राजनीतिक अन्याय को समझने का आमंत्रण
20-30 मार्च, 2026
संभावना संस्थान पिछले कई वर्षों से युवाओं और कार्यकर्ताओं के साथ सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक अन्याय से जुड़े मुद्दों पर दृष्टिकोण को व्यापक करने के लिए कार्यक्रम आयोजित करते आए है । इस श्रृंखला में हम युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ बुनियाद नाम का कार्यक्रम कर रहे हैं | यह कार्यक्रम उन युवा साथियों के लिए है जो किसी भी रूप से सामाजिक कार्य में जुटे हुए हैं ।
बुनियादी समझ की ज़रूरत क्यों है?
सामाजिक बदलाव और बदलाव की राजनीति में भागीदारी की प्रक्रिया जटिल है।इस समय भारत की राजनीति नफरत के आधार पर चलाई जा रही है | नफरत के मुख्य निशाने पर मुसलमानों और ईसाईयों को रख कर उन पर हमले करके बहुसंख्यक आबादी के जीवन से जुड़े मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है, पूंजीवादी कारपोरेटों को फायदा पहुंचाने के लिए आदिवासी इलाकों में जल जंगल ज़मीन की लूट और मानवाधिकारों का दमन किया जा रहा है और मजदूरों के श्रम को लूटने के लिए कानूनों में बदलाव किये जा रहे हैं | हाल ही में अरावली पर्वत पर खनन के लिए कब्ज़ा करने का उदाहरण, हसदेव अरण्य और निकोबार के जंगल काट कर विकास के नाम पर ज़मीन पूंजीपतियों को दी जा रही है.
आज के राजनीतिक माहौल में कार्यकर्ताओं के सामने कई चुनौतियां खड़ी हैं – समाज में उदासीनता और बढ़ती असहिष्णुता; ‘विकास’ के नाम पर संसाधनों का बढ़ता निजीकरण और केंद्रीकरण; लोकतान्त्रिक प्रक्रियों की घटती जगह और जाति, धर्म, वर्ग, लिंग आधारित शोषण के पेचीदा अंतरसंबंधों का जाल – ये सब नई मैदानी उलझनों और सवालों को खड़ा कर रहे हैं | अभी हाल ही में वोट चोरी की परिघटना ने राजनैतिक न्याय और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ही बेमानी बना दिया है जिसे गम्भीर चुनौती मान कर काम करने की ज़रूरत है | परन्तु राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों का गहराई से अध्ययन और चिंतन करने तथा इस चिंतन को अपने काम में शामिल करने का समय या मौक़ा अधिकतर युवा साथियों को नहीं मिल पाता । इन मुद्दों को साझे रूप से परखने और विकसित करने की प्रक्रिया है यह कार्यक्रम जिसका नाम है, बुनियाद।
भारत का समाज पितृसत्ता, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, और पूंजीवाद जैसी अनेकों तरह की चुनौतियों से घिरा हुआ है और समाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक बदलावों की ज़रूरतों की मांग करता है |
कई बार ऐसा अनुभव में आता है कि एक विषय पर काम करने वाले युवा/कार्यकर्ता की समझ अन्य विषय पर अधूरी या कई बार दोषपूर्ण भी हो सकती है | उदाहरण के लिए मजदूरों को संगठित करने वाले युवा की समझ जेंडर को लेकर अपूर्ण या दोषपूर्ण हो सकती है | इसलिए एक ऐसे कार्यक्रम की संकल्पना की गई है जिसमें युवा कार्यकर्ताओं को मुख्य चुनौतियों और मुद्दों की समझ बनाने की प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर दिया जाता है |
क्या आप एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता हैं ?
- क्या आप शोषण के ढांचागत कारणों को समझने की प्रक्रिया में शामिल हैं ?
- क्या राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक असमानता के अंतरसम्बन्धों को और गहराई से जानना चाहते हैं ?
- क्या बदलाव की राजनीति में जुड़े अपने जैसे और युवा साथियों से जुड़ कर एक सांझा चिंतन करने को उत्सुक हैं ?
- यदि हाँ, तो बन जाइये सहयात्री इस 10 दिनों के सफर में …
कार्यक्रम के बारे में:
भारतीय समाज में धार्मिक विविधता के साथ जातीय भेदभाव का इतिहास सदियों पुराना है। जातिगत दमन और शोषण को धार्मिक नारों की आड़ में उस पर पर्दा डालकर पीड़ितों को ही आपस में लडवाया जा रहा है | समाज के इसी ढांचे को विस्तार से समझना और उनकी एक दुसरे के साथ जुडी कड़ियों को जोड़ना ही बुनियाद कार्यक्रम का उद्देश्य है। इसके साथ वास्तविक चुनौतियाँ जैसे साम्प्रदायिकता, कौमवाद, और पूंजीवाद के तलवे चाटती हुई सरकार जिसने सत्ता की भूख और मुनाफे के लिए पर्यावरण को दाव पर रखा है उसे समझेंगे।
कार्यक्रम में अलग-अलग स्रोत व्यक्ति, प्रतिभागियों के साथ अपने अनुभव सांझा करेंगे । चर्चा के मुख्य विषय कुछ इस प्रकार होंगे:
- ‘विकास’ क्या है ? भारत में किसका विकास किया जा रहा है ? किसका विनाश हो रहा है ? संसाधनों की लूट, मजदूरी की लूट क्या है ?
- जाति, साम्प्रदायिकता, राष्ट्रवाद और पितृसत्ता – आज के हालात, ऐतिहासिक परिपेक्ष, और इनका हमारे प्रयासों से लेन-देन |अर्थव्यवस्था, पूंजीवाद और नव उदारवादी आर्थिक ढांचे, विकास – इनके अंतर्सम्बध, और इनसे जुड़े मुख्य मुद्दे जेंडर तथा लिंग आधारित भेदभाव कैसे हो रहा है?
- राज्य का स्वरुप और लोकतंत्र की चुनौतियां
- साम्प्रदायिकता क्या है ? नफरत की राजनीति किसे कहते हैं ? उसका इतिहास और स्वरूप क्या है ? समाधान क्या है ?
- स्वयं के अनुभव, संघर्ष और चुनौतियाँ – समाज, और सामाजिक कार्य में क्या है हमारी पहचान ?
- जन आन्दोलन – संघर्ष और निर्माण का अंतर्सम्बध, पुराने प्रयासों से सीख, बदलाव की राजनीति क्या है ? इसकी चुनौतियां, और आगे के रास्ते …
10 दिन का यह कार्यक्रम युवाओं और ज़मीनी कार्यकर्ताओं को आज की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझते हुए स्वयं का दृष्टिकोण स्पष्ट करने और बनाने का एक प्रयास करता है। साथ ही आपस में, तथा अनुभवी कार्यकर्ताओं के साथ संवाद से सीखने, समझने और प्रेरणा हासिल करने का एक अवसर है।
कार्यशाला की शिक्षण-विधि:
- भाषण
- क्षेत्र की यात्रा
- चर्चा–बहस
- विभिन्न सामूहिक गतिविधियाँ
- थिएटर एवं फ़िल्मों का प्रयोग करते हुए उपरोक्त विषयों पर बातचीत
सहजकर्ता / स्त्रोत व्यक्ति:
- Prashant Bhushan: Prashant Bhushan is a senior public interest advocate, human rights activist and is the founder of Sambhaavanaa. He has fought several cases in the Supreme Court of India for the rights of the poor and the marginalised. He is known for his use of public interest litigation to support a number of causes related to corruption in high places, environmental protection and human rights. He is also the convenor of the Campaign for Judicial Accountability and Reforms and a founding member of the Centre for Public Interest Litigation that takes up public interest causes pro bono in the High Court and Supreme Court of India.
- हिमांशु कुमार: हिमांशु जी इस कार्यशाला के संचालक और स्त्रोत व्यक्ति के रूप में हमारे साथ जुड़ेंगे. हिमांशु कुमार के बारे में अधिक जानकारी के लिए उनके नाम पर क्लिक करें।
- अमृता जौहरी: अमृता जौहरी सतर्क नागरिक संगठन की सदस्य हैं। वह सूचना के अधिकार और भोजन के अधिकार अभियान में सक्रिय रूप से शामिल रही हैं।
- नवशरण सिंह: नवशरण एक लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे महिला अधिकारों, मानवाधिकारों और किसान आंदोलनों से जुडी रही है।
- प्रशांत भूषण:
- योगेंद्र यादव: योगेंद्र यादव एक भारतीय राजनीतिक कार्यकर्ता, चुनाव विशेषज्ञ और लेखक हैं।
- दूनु रॉय: अनुभ्रत्तो कुमार रॉय, जिन्हें दूनु रॉय के नाम से जाना जाता है, पेशे से रासायनिक इंजीनियर हैं, मजबूरी में समाजशास्त्री बने और अपनी पसंद से राजनीतिक पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।
- फातिमा चप्पलवाला: एक शिक्षिका, लेखिका और थिएटर ऑफ़ द ओप्रेस्ड की अभ्यासकर्ता हैं, जो रचनात्मक और सहभागिता-आधारित शिक्षण के माध्यम से राजनीतिक चेतना को बढ़ावा देती हैं। उनका काम जेंडर, जाति और संस्कृति के जटिल संबंधों को छूता है और थिएटर को संवाद, प्रतिरोध और सामूहिक आत्मचिंतन के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करता है। फातिमा एक होमस्कूलिंग माँ भी हैं जो मानती हैं कि सीखने की शुरुआत सवालों से होती है। अभी ये संभावना संस्थान की टीम के सदस्य हैं।
- मोहम्मद चप्पलवाला: यह एक थिएटर ऑफ द ओप्रेस्ड (TOTO) अभ्यासक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिनके पास सामाजिक न्याय के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। ये संभावना संस्थान की टीम के सदस्य हैं और कार्यशालाओं में TOTO को शिक्षा का एक साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं, खासकर भेदभाव, जाति और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर। उन्होंने TOTO अभ्यासों को उन लोगों के लिए आसान और सुलभ बनाने का काम किया है, जो सामाजिक बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं।
इन्टर्नशिप:
इसके अलावा जो प्रतिभागी इस दस दिन के प्रशिक्षण के बाद सामाजिक आन्दोलन, संगठन या संस्था में जाकर ज़मीनी अनुभव लेना चाहते हैं वे आवेदन में अपनी सहमति का ज़िक्र कर दें | संभावना टीम प्रतिभागियों में से चिन्हित प्रतिभागियों को चुनेगी और उन्हें देश के प्रमुख सामाजिक आन्दोलन, संगठन संस्था में एक माह की इन्टर्नशिप के लिए भेजेगी | यह प्रक्रिया आपके अनुभवों को समृद्ध करने और भविष्य के लिए काम का क्षेत्र निर्धारित करने में मददगार होगा |
भाषा: हिंदी
कार्यक्रम में शामिल होने के लिए:
यह कार्यक्रम उन युवा कार्यकर्ताओं व छात्रों के लिए है जो 25 से 40 वर्ष की उम्र श्रेणी में हैं | आपने किसी सामाजिक संस्था, संगठन, जन – आन्दोलन के साथ कार्य या वोलंटियर किया हो |
कार्यक्रम का शुल्क :
यह कार्यशाला किसी भी सरकारी संस्था या कम्पनी द्वारा आयोजित नहीं की जा रही है । अत: आशा करते हैं प्रतिभागी अपने रहने-खाने की व्यवस्था के कुछ हिस्से को पूरा करने के लिए 5500/- रूपये का अंशदान कर सकते हैं । जो प्रतिभागी अंशदान की राशि में कुछ छूट चाहते हैं वे आवेदन में अलग से इसका ज़िक्र कर सकते हैं |
तारीख: 20-30 मार्च, 2026
स्थान: संभावना संस्थान, पालमपुर, हिमाचल प्रदेश
अन्य जानकारी अथवा पूछताछ के लिए – व्हाट्सप्प/कॉल:+91-889 422 7954 (केवल 10 am – 5 pm के बीच कॉल करे); ईमेल – [email protected]
नीचे दिए हुए फॉर्म पर आवेदन करें: